चकरभाठा के श्री झूलेलाल मंदिर में सनातन संस्कृति का शंखनाद: संत साईंलाल दास जी के सानिध्य में 41 बटुकों का हुआ सामूहिक जनेऊ संस्कार
माता-पिता पूजनोत्सव ने बिखेरी श्रद्धा की महक; चकरभाठा बना भक्ति और संस्कारों का संगम स्थल
छत्तीसगढ़, एमपी और महाराष्ट्र से पहुंचे श्रद्धालु; सेवा और समर्पण की अनूठी मिसाल पेश
बिलासपुर / चकरभाठा | 14 फरवरी 2026चकरभाठा स्थित श्री झूलेलाल मंदिर में आज एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक गौरव का दिन रहा। पूज्य संत साईंलाल दास जी के पावन सानिध्य में आयोजित भव्य समारोह में न केवल 41 बटुकों का वैदिक रीति-रिवाज से जनेऊ (यज्ञोपवीत) संस्कार संपन्न हुआ, बल्कि ‘माता-पिता पूजन दिवस’ के माध्यम से नई पीढ़ी को संस्कारों की संजीवनी भी दी गई। इस दोहरे उत्सव ने पूरे क्षेत्र को भक्ति, अनुशासन और पारिवारिक मूल्यों के रंग में सराबोर कर दिया।


वैदिक मंत्रोच्चार के बीच आध्यात्मिक शुरुआत
कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ प्रातः 11 बजे आराध्य देव भगवान झूलेलाल एवं ब्रह्मलीन बाबा गुरुमुख दास जी की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन व पुष्पांजलि के साथ हुआ। विद्वान पंडित पुरन शर्मा जी के आचार्यत्व में 41 बटुकों ने सनातन धर्म के 16 संस्कारों में से एक ‘यज्ञोपवीत संस्कार’ ग्रहण किया। मंत्रों की गूंज और आहुतियों के बीच बटुकों ने ब्रह्मचर्य, ज्ञान और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।


जनेऊ: केवल धागा नहीं, अनुशासन का कवच
इस अवसर पर पूज्य सिंधी पंचायत के पूर्व अध्यक्ष प्रकाश जैसवानी ने समाज को संबोधित करते हुए कहा कि जनेऊ धारण करना महज एक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण और कर्तव्यों का बोध है। उन्होंने सिंधी संस्कृति में जनेऊ और चोटी के ऐतिहासिक महत्व को साझा करते हुए बटुकों को इसे मर्यादा पूर्वक धारण करने की सीख दी। पंडित पुरन शर्मा ने गायत्री मंत्र की महिमा और जनेऊ के तीन सूत्रों (देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण) की विस्तृत व्याख्या की।
माता-पिता पूजन: जब श्रद्धा से नम हुई आंखें
दोपहर 1 बजे आयोजित ‘माता-पिता पूजन’ कार्यक्रम भावुकता की पराकाष्ठा पर रहा। जनेऊ धारण करने वाले बच्चों ने अपने माता-पिता का तिलक कर, आरती उतारी और उनके चरणों में शीश नवाकर आशीर्वाद लिया। इस दृश्य ने उपस्थित जनसमूह को भाव-विभोर कर दिया, जो आधुनिक दौर में लुप्त होते पारिवारिक मूल्यों को पुनः स्थापित करने का एक सशक्त प्रयास दिखा।
संत साईंलाल दास जी के अमृत वचन
अपने संबोधन में संत साईंलाल दास जी ने कहा, “माता-पिता के चरणों में ही चारों धाम का वास है। उनकी सेवा ही सबसे बड़ा तीर्थ है।” उन्होंने युवाओं को चेतावनी देते हुए कहा कि कभी ऐसा कार्य न करें जिससे कुल और माता-पिता की प्रतिष्ठा धूमिल हो। उन्होंने बच्चों को मोबाइल की आभासी दुनिया से निकलकर सत्संग, सेवा और अपनी मूल सिंधी भाषा व संस्कृति से जुड़ने का आह्वान किया।
भजन संध्या और सामाजिक सहभागिता


भजन गायक अनिल पंजवानी एवं रवि रुपवानी की सुमधुर प्रस्तुतियों ने श्रद्धालुओं को नृत्य करने पर मजबूर कर दिया। ‘लेडीज संगीत’ ने उत्सव की रौनक दोगुनी कर दी। इसके पश्चात विशाल भंडारे का आयोजन हुआ, जिसमें हज़ारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। कार्यक्रम का डिजिटल महत्व भी दिखा, जहां सोशल मीडिया लाइव के माध्यम से हज़ारों लोग इस आध्यात्मिक ऊर्जा से जुड़े
इनका रहा विशेष योगदान
आयोजन को सफल बनाने में बाबा गुरमुख दास सेवा समिति तथा झूलेलाल महिला सखी सेवा ग्रुप के सदस्यों ने अहर्निश सेवा की। छत्तीसगढ़ के साथ-साथ मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र से आए परिजनों ने इस आयोजन को एक अंतरराज्यीय सांस्कृतिक महाकुंभ का स्वरूप दे दिया।



