RTI 2005 के बाद भी “धारा 1999 की धारा 40”? चिरगुड़ा पंचायत में कानून की नई व्याख्या पर बड़ा सवाल
बैकुंठपुर।-जनपद पंचायत बैकुंठपुर के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत चिरगुड़ा में सूचना के अधिकार (RTI) को लेकर एक गंभीर प्रशासनिक विवाद सामने आया है।
आरोप है कि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी गई जानकारी को पंचायत ने देने से इंकार कर दिया और अपने लिखित उत्तर में “धारा 40, वर्ष 1999” का हवाला दिया। इस जवाब ने कानून की वैधता और प्रशासनिक पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या है पूरा मामला?
सूत्रों के अनुसार, एक आवेदक ने पंचायत से संबंधित कार्यों और अभिलेखों की जानकारी सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी थी। नियमानुसार 30 दिनों के भीतर सूचना उपलब्ध कराना या वैधानिक कारण बताना आवश्यक होता है।
लेकिन पंचायत की ओर से दिए गए लिखित उत्तर में जानकारी देने से मना करते हुए “धारा 40, वर्ष 1999” का उल्लेख किया गया। जबकि RTI अधिनियम 2005 में सूचना रोकने के लिए स्पष्ट रूप से धारा 8 और धारा 9 जैसे प्रावधान मौजूद हैं।

2005 का कानून, 1999 की धारा?
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 देशभर में लागू है और इसी अधिनियम के तहत सूचना देने या न देने का निर्णय लिया जाता है। ऐसे में 1999 की किसी धारा का हवाला देकर सूचना रोका जाना कानूनी प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि सूचना रोकनी भी हो, तो RTI Act 2005 की संबंधित धाराओं का स्पष्ट उल्लेख करना अनिवार्य है। अन्य वर्ष की धारा का हवाला देना या असंबंधित कानून का उल्लेख करना प्रशासनिक भ्रम या प्रक्रिया में त्रुटि की ओर संकेत करता है।
शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं
मामले की लिखित शिकायत जनपद पंचायत बैकुंठपुर के संबंधित अधिकारियों को दी गई। हालांकि, अब तक किसी ठोस जांच, नोटिस या सार्वजनिक कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई है।
अधिकारियों की इस चुप्पी ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। स्थानीय नागरिकों के बीच चर्चा है कि—
क्या यह कानून की जानकारी का अभाव है?
या जानबूझकर सूचना रोकी जा रही है?
क्या जनपद स्तर पर मामले की निष्पक्ष जांच होगी?
यदि त्रुटि हुई है, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
प्रशासनिक जवाबदेही पर प्रश्नचिन्ह
पंचायती राज व्यवस्था का उद्देश्य जमीनी स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। सूचना का अधिकार कानून आम नागरिक को शासन से जवाब मांगने का संवैधानिक साधन प्रदान करता है।
यदि सूचना मांगने पर गलत या असंबंधित धाराओं का हवाला देकर जानकारी रोकी जाती है, तो यह न केवल कानूनी प्रक्रिया पर प्रश्न उठाता है, बल्कि आम नागरिकों के विश्वास को भी प्रभावित करता है।
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि समय पर निष्पक्ष जांच और स्पष्ट कार्रवाई नहीं हुई, तो वे उच्च प्रशासनिक अधिकारियों एवं राज्य सूचना आयोग का रुख करने पर विचार करेंगे।
अब आगे क्या?
पूरा मामला अब प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही की कसौटी बन चुका है। सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित अधिकारी इस विवाद पर क्या आधिकारिक स्पष्टीकरण देते हैं और क्या जांच प्रक्रिया शुरू की जाती है।


