
सूरजपुर में शिक्षा माफिया का काला कारनामा: नोडल प्राचार्य की आईडी हैकिंग या सांठगांठ का गहरा षड्यंत्र….?
सूरजपुर। जिले में शिक्षा माफिया की काली करतूतों ने एक बार फिर शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राइट टू एजुकेशन (आरटीई) की प्रतिपूर्ति राशि हड़पने के लिए नोडल प्राचार्य की लॉगिन आईडी और पासवर्ड हैक करने का सनसनीखेज मामला सामने आने के बाद अब और भी चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। अपुष्ट सूत्रों के हवाले से खबर है कि इस घोटाले में शामिल चार में से केवल एक स्कूल ही वास्तव में संचालित है, जबकि बाकी तीन स्कूल कागजी खानापूर्ति कर वर्षों से आरटीई की करोड़ों रुपये की राशि का बंदरबांट कर रहे हैं। इस मामले में केवल नोटिस जारी कर औपचारिकता पूरी करने की कवायद और पुलिस शिकायत से दूरी ने शिक्षा माफिया व विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत की आशंका को और बल दे दिया है। वहीं दूसरी तरफ
जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग ने जांच शुरू कर दी है, लेकिन यह देखना बाकी है कि यह जांच कागजी कार्रवाई तक सीमित रहेगी या वास्तव में दोषियों को सजा दिलाएगी। यदि यह साइबर अपराध है, तो साइबर सेल की भूमिका अहम होगी। इस मामले ने सूरजपुर के शिक्षा तंत्र में व्याप्त गड़बड़ियों को उजागर कर दिया है और लोगों के बीच भरोसे की कमी को और गहरा कर दिया है। क्या इस बार सच सामने आएगा या फिर एक बार फिर बहानों के सहारे जांच को दबा दिया जाएगा…..? यह सवाल हर किसी के मन में है।
यह है अबतक सामने आया मामला
जानकारी के मुताबिक, कुछ निजी स्कूल संचालकों ने शिक्षा गारंटी योजना के पोर्टल पर नोडल प्राचार्य की लॉगिन डिटेल्स का दुरुपयोग कर 31 जुलाई को बिना अनुमति दावा सत्यापन कर लिया। जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) ने इस अनियमितता पर चार स्कूलों—इंडियन पब्लिक स्कूल (हिंदी व अंग्रेजी माध्यम, मानी), गुरुकुल पब्लिक स्कूल (हिंदी व अंग्रेजी माध्यम, कुरुवां), ओमकार पब्लिक स्कूल (अंग्रेजी माध्यम, कोरेया) और ज्ञानगंगा पब्लिक स्कूल (अंग्रेजी माध्यम, कुरुवां)—को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। डीईओ ने इसे गंभीर धोखाधड़ी और अनुशासनहीनता करार देते हुए चेतावनी दी है कि जवाब न मिलने पर इन स्कूलों की प्रतिपूर्ति राशि की फाइलें उच्च कार्यालय को नहीं भेजी जाएंगी।
कागजी स्कूलों का खेल, इसमें भी झोल
अपुष्ट सूत्रों के अनुसार, चार में से केवल इंडियन पब्लिक स्कूल ही वास्तव में संचालित है। शेष तीन स्कूल—गुरुकुल पब्लिक स्कूल, ओमकार पब्लिक स्कूल और ज्ञानगंगा पब्लिक स्कूल—न तो शैक्षणिक संस्थानों के मापदंड पूरे करते हैं और न ही नियमों का पालन करते हैं। ये स्कूल कथित तौर पर केवल कागजी खानापूर्ति कर संचालित दिखाए जा रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि जिले में कई सफेदपोश लोग वर्षों से शिक्षा माफिया बनकर करीब 50 से अधिक स्कूलों के नाम से विभागीय सांठ-गांठ कर
आरटीई की राशि का करोड़ों रुपये का बंदरबांट कर चुके हैं। यदि इस मामले की उच्च स्तरीय जांच हो, तो कई वर्तमान और पूर्व शिक्षा विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका उजागर हो सकती है।
सचमुच हैकिंग या सांठगांठ….?
नोडल प्राचार्य की लॉगिन डिटेल्स का दुरुपयोग इतने बड़े पैमाने पर बिना आंतरिक सहयोग के संभव नहीं माना जा रहा। स्थानीय लोग और जानकार सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह वाकई साइबर हैकिंग है या शिक्षा माफिया और कुछ अधिकारियों की साठगांठ का नतीजा….? इस मामले में पुलिस में एफआईआर दर्ज न कर केवल नोटिस जारी करने की कार्रवाई को औपचारिकता माना जा रहा है। इससे यह आशंका गहरा रही है कि कहीं यह किसी बड़े घोटाले पर पर्दा डालने की कोशिश तो नहीं।
आरटीई पर दबाव की साजिश तो नहीं….?
सूत्रों के हवाले से यह भी खबर है कि इस प्रकरण के पीछे आरटीई अधिनियम के तहत पात्र शैक्षणिक संस्थानों पर दबाव बनाने की साजिश हो सकती है। माना जा रहा है कि कुछ स्कूलों को अनुचित लाभ पहुंचाने या उनसे उगाही करने के लिए यह हथकंडा अपनाया गया हो। यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या यह मामला कागजी स्कूलों को संरक्षण देने और निष्पक्ष जांच को टालने की रणनीति का हिस्सा है?
दाग भी तो पूराने है,पहले भी विवादों में रहा विभाग
सूरजपुर का शिक्षा विभाग पहले भी विवादों के घेरे में रहा है। कागजी स्कूलों को नोटिस जारी करने के नाम पर रिश्वतखोरी के मामले में डीईओ सहित कई अधिकारी एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) की कार्रवाई की जद में आ चुके हैं। इसके बावजूद, लंबे समय से इस तरह की गड़बड़ियों पर जांच के नाम पर पर्दा डालने का सिलसिला जारी है। सूत्रों का कहना है कि अलग-अलग बहानों से निष्पक्ष जांच को रोका जाता रहा है, जिससे शिक्षा माफिया का हौसला और बुलंद हुआ है।
जनचर्चा में उबाल, मांग रही कड़ी कार्रवाई
मामला सार्वजनिक होने के बाद स्थानीय लोगों और अभिभावकों में आक्रोश है। जनचर्चा में सवाल गूंज रहे हैं—क्या यह साइबर अपराध है या सांठगांठ का नतीजा? पुलिस शिकायत क्यों नहीं दर्ज की गई…? क्या नोटिस केवल दिखावटी कार्रवाई है….? लोग मांग कर रहे हैं कि इस मामले की उच्च स्तरीय जांच हो और दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए। विशेषज्ञों का कहना है कि नोडल प्राचार्य की लॉगिन डिटेल्स का दुरुपयोग साइबर अपराध की श्रेणी में आता है, और इसके लिए एफआईआर दर्ज कर साइबर सेल को जांच सौंपनी चाहिए।