सुप्रीम कोर्ट से अमित बघेल को तगड़ा झटका: ‘जुबान पर लगाम रखें’ की सख्त टिप्पणी
छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया में अपने तीखे तथा कई बार विवादास्पद बयानों के लिए मशहूर, छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के अध्यक्ष और जोहार छत्तीसगढ़ पार्टी के प्रमुख अमित बघेल को देश की सर्वोच्च अदालत से करारा झटका लगा है। अपने खिलाफ दर्ज कई एफआईआर के कानूनी पेंच से राहत पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे बघेल को न केवल अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) देने से इनकार कर दिया गया, बल्कि कोर्ट ने उनके बयानों की प्रकृति पर एक सख्त और स्पष्ट टिप्पणी भी की।

अग्रिम जमानत और FIR क्लबिंग की मांग खारिज
विभिन्न जिलों में अपने कथित रूप से भड़काऊ और विवादित बयानों को लेकर अमित बघेल के खिलाफ कई प्राथमिकियाँ (FIRs) दर्ज की गई हैं। इन मामलों से बचाव के लिए, बघेल ने सुप्रीम कोर्ट में दो प्रमुख मांगें रखी थीं:
- उन्हें इन मामलों में गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान करते हुए अग्रिम जमानत दी जाए।
- राज्य के अलग-अलग स्थानों पर दर्ज की गई सभी संबंधित एफआईआर को एक साथ जोड़कर (Clubbing) एक ही जगह चलाया जाए, ताकि कानूनी प्रक्रिया सरल हो सके।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने दोनों ही तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया।
न्यायालय की तीखी टिप्पणी: “अपनी ज़ुबान पर लगाम रखें”
सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति ने बघेल के बयानों की गंभीरता पर कड़ी आपत्ति व्यक्त की। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “अपनी ज़ुबान पर लगाम रखें (Keep a check on your tongue).” यह टिप्पणी सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक जीवन में सक्रिय किसी भी व्यक्ति के लिए आचरण संहिता (Code of Conduct) का एक सख्त संदेश है। न्यायालय ने यह संकेत दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech) असीमित नहीं है, खासकर तब जब बयान सामाजिक सौहार्द या कानून व्यवस्था के लिए खतरा पैदा करने की क्षमता रखते हों।
राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थ
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय अमित बघेल और उनकी पार्टी ‘जोहार छत्तीसगढ़’ के लिए एक बड़ी विधिक और नैतिक चुनौती प्रस्तुत करता है। बघेल की राजनीति का आधार ही उनके तीखे और आक्रामक भाषण रहे हैं, जो छत्तीसगढ़ के स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित होते हैं। अब सुप्रीम कोर्ट की इस फटकार के बाद, उन्हें अपनी सार्वजनिक संवाद शैली (Public Discourse Style) पर गंभीर रूप से पुनर्विचार करना होगा।
यह फैसला एक मिसाल भी कायम करता है कि कानूनी प्रक्रिया से बचने के लिए विवादास्पद बयानबाजी को ढाल नहीं बनाया जा सकता। अब बघेल को जमानत के लिए निचली अदालतों में लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी होगी और उन्हें न्यायिक प्रक्रिया के समक्ष अपने बयानों की वैधानिकता को सिद्ध करना होगा। इस घटना ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि देश में कानून का शासन ही सर्वोपरि है, और किसी भी व्यक्ति की प्रसिद्धि या राजनीतिक प्रभाव उसे कानूनी जवाबदेही से मुक्ति नहीं दिला सकता।



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