नगर निगम रायपुर के दोहरे मापदंड उजागर; सरकारी गली बताकर तोड़ी सीढ़ी, अब उसी जमीन पर भू-माफिया का कब्जा
रायपुर। राजधानी के नगर निगम प्रशासन की कार्यशैली एक बार फिर गंभीर विवादों के घेरे में है। मामला शहर के एक नागरिक की निजी संपत्ति को “सरकारी” बताकर तोड़ने और फिर उसी जमीन पर रसूखदारों को अवैध कब्जा दिलाने का है। पीड़ित विनय ताम्रकार पिछले डेढ़ साल से न्याय की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन निगम के अधिकारियों से लेकर जनप्रतिनिधियों तक की रहस्यमयी चुप्पी ने भ्रष्टाचार के आरोपों को हवा दे दी है।

क्या है पूरा मामला?
घटना की शुरुआत 22 सितंबर 2023 को हुई, जब नगर निगम के अमले ने विनय ताम्रकार के आवास की सीढ़ी को यह कहते हुए जमींदोज कर दिया कि वह ‘सरकारी गली’ में बनी है। उस वक्त निगम ने इसे अतिक्रमण के खिलाफ बड़ी कार्रवाई बताया था। लेकिन कहानी में मोड़ तब आया, जब उसी ‘सरकारी गली’ की जमीन पर निगम की नाक के नीचे एक अन्य व्यक्ति ने कब्जा कर पक्का निर्माण शुरू कर दिया।

भ्रष्टाचार और मिलीभगत के आरोप
पीड़ित विनय ताम्रकार का सीधा आरोप है कि नगर निगम के अधिकारियों ने सुनियोजित तरीके से उनकी सीढ़ी तोड़ी ताकि उस कीमती जमीन को किसी और को फायदा पहुँचाने के लिए खाली कराया जा सके। पीड़ित का कहना है कि:
“जिस जमीन को सरकारी बताकर मेरी बरसों पुरानी सीढ़ी तोड़ी गई, उसे कथित तौर पर बेच दिया गया या रसूखदारों के हवाले कर दिया गया। आज वहां निर्माण कार्य पूरा हो चुका है, लेकिन निगम का बुलडोजर अब खामोश है।”

सिस्टम की संवेदनहीनता: “हम कुछ नहीं कर सकते”
न्याय की आस में पीड़ित ने निगम के हर दरवाजे पर दस्तक दी। वे जोन कमिश्नर, जोन अध्यक्ष बद्री गुप्ता और क्षेत्रीय पार्षद के पास भी गए। पीड़ित का दावा है कि इन सभी जिम्मेदार पदों पर बैठे व्यक्तियों का एक ही रटा-रटाया जवाब था— “हम कुछ नहीं कर सकते।” यह बयान अपने आप में निगम की विफलता को दर्शाता है। सवाल यह उठता है कि:
यदि जिम्मेदार अधिकारी कुछ नहीं कर सकते, तो उन्होंने किस अधिकार से निजी संपत्ति पर तोड़फोड़ की?
क्या निगम के नियम केवल आम आदमी को प्रताड़ित करने के लिए हैं?
सरकारी जमीन पर दोबारा कब्जा और निर्माण कैसे हो गया?
महापौर के आश्वासनों का पिटारा खाली
पीड़ित विनय ताम्रकार ने बताया कि वे महापौर मीनल चौबे से भी 5 से 6 बार मुलाकात कर चुके हैं। हर बार उन्हें ठोस कार्रवाई का भरोसा तो दिया गया, लेकिन धरातल पर परिणाम शून्य रहा। डेढ़ साल के इस लंबे संघर्ष के दौरान कब्जाधारी ने अपना निर्माण कार्य भी पूर्ण कर लिया है, जो निगम की मिलीभगत की पुष्टि करता है।
जनता में आक्रोश और निष्पक्ष जांच की मांग
यह मामला केवल एक व्यक्ति की सीढ़ी टूटने का नहीं है, बल्कि नगर निगम रायपुर की पारदर्शिता और ईमानदारी पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। क्या शहर की सरकारी जमीनें
प्रभावशाली लोगों के लिए ‘सेल’ पर हैं?
पीड़ित ने अब शासन-प्रशासन से इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग की है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई और उन्हें न्याय नहीं मिला, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।

