55 से अधिक कवि-कवयित्रियों की सहभागिता से सजा साहित्यिक महाकुंभ, प्रतिभाओं एवं गौ संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वालों का हुआ सम्मान।

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ साहित्य एवं संस्कृति मंच के तत्वावधान में रविवार, 25 अक्टूबर 2026 को महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी, मंगला, बिलासपुर में ‘संत और सिपाही’ छत्तीसगढ़ साझा संकलन के विमोचन, सम्मान समारोह एवं भव्य कवि सम्मेलन का गरिमामय आयोजन किया गया। साहित्य, अध्यात्म, राष्ट्रभक्ति, समाजसेवा और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता को समर्पित इस आयोजन में प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए 55 से अधिक कवि-कवयित्रियों एवं साहित्यकारों ने सहभागिता कर समारोह को यादगार बना दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ कार्यक्रम अध्यक्ष, संरक्षक एवं विशिष्ट अतिथियों के करकमलों से गुरु महर्षि एवं मां वीणापाणि की वंदना के साथ हुआ। श्री राम निहोरा सिंह राजपूत ने सुमधुर स्वागत गीत प्रस्तुत किया। मंचासीन अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ, अंगवस्त्र एवं श्रीफल भेंटकर किया गया।
कार्यक्रम संयोजक श्री दीपक दुबे ‘सागर’ ने ‘संत और सिपाही’ साझा संकलन की परिकल्पना एवं उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस कृति के माध्यम से संतों की आध्यात्मिक चेतना, मानवीय मूल्यों तथा सैनिकों के अदम्य साहस, त्याग और राष्ट्र के प्रति समर्पण को साहित्य के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है।
तीन साहित्यिक कृतियों का हुआ विमोचन
समारोह में मंचासीन अतिथियों द्वारा ‘संत और सिपाही’ छत्तीसगढ़ साझा संकलन का विमोचन किया गया। इसके साथ ही ठा. व्यास सिंह ‘गुमसुम’ के छत्तीसगढ़ी संकलन ‘चंदबौरी’ तथा दशरथ सिंह ‘मतवाले’ की कृति ‘फूल गजरा’ का भी विमोचन हुआ। साहित्यकारों ने इन कृतियों को छत्तीसगढ़ की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने वाला महत्वपूर्ण प्रयास बताया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में महर्षि जी की जीवनी पर संकलन प्रकाशित करने की भावना व्यक्त
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे महर्षि विश्वविद्यालय, बिलासपुर के कुलपति डॉ. नरेश कुमार तिवारी ने ‘संत और सिपाही’ विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संत समाज को आध्यात्मिक दिशा प्रदान करते हैं, जबकि सैनिक राष्ट्र की रक्षा के लिए त्याग, साहस और समर्पण का परिचय देते हैं। उन्होंने आगामी समय में महर्षि जी की जीवनी पर आधारित संकलन प्रकाशित कराने की भावना भी व्यक्त की।
अतिविशिष्ट अतिथि परम पूज्य महंत दिव्यकांत दास जी महाराज ने संत और सिपाही को सनातन संस्कृति के अभिन्न अंग बताते हुए कहा कि संत अपने ज्ञान एवं आध्यात्मिक चिंतन से समाज का मार्गदर्शन करते हैं, वहीं सैनिक अपने शौर्य से राष्ट्र की रक्षा करते हैं। उन्होंने इस विषय पर साहित्यिक पहल की सराहना की।
अतिथियों ने साहित्य, संस्कृति और राष्ट्रसेवा को बताया समाज की शक्ति
विशिष्ट अतिथि श्री महेंद्र सिंह राणा ने सैनिकों के अनुशासन, त्याग, राष्ट्रनिष्ठा और कर्तव्यपरायणता को राष्ट्र की शक्ति बताते हुए युवाओं से देशसेवा के आदर्शों को आत्मसात करने का आह्वान किया। विशिष्ट अतिथि श्री शैलेन्द्र सिंह कछवाहा ने साहित्य को सामाजिक जागरूकता, मानवीय संवेदना और जनकल्याण का प्रभावी माध्यम बताया। विशिष्ट अतिथि डॉ. अनिता सिंह ने साहित्यिक सृजन को समाज की भावनाओं, अनुभवों और विचारों की सशक्त अभिव्यक्ति बताते हुए ऐसे आयोजनों को रचनाकारों के लिए प्रेरणादायी बताया।
कार्यक्रम संरक्षक डॉ. रमेश चंद्र श्रीवास्तव ने आयोजन की सराहना करते हुए साहित्य एवं संस्कृति के संरक्षण में सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया। मार्गदर्शक श्री अशोक शर्मा ‘अद्वितीय’ ने साहित्यकारों से अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में सकारात्मक चेतना, सद्भावना और सांस्कृतिक मूल्यों का प्रसार करने का आह्वान किया।
उत्कृष्ट प्रतिभाओं एवं गौ संरक्षण के लिए सम्मान
समारोह में राष्ट्रीय स्तर की कराटे प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक अर्जित करने वाली कु. पूनम नेताम एवं कु. नीता ध्रुव को ‘उत्कृष्ट प्रतिभा सम्मान’ से सम्मानित किया गया। वहीं गौ संरक्षण एवं जनकल्याण के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय योगदान के लिए श्रीमती रश्मि शर्मा एवं श्रीमती स्वर्णा उपाध्याय को ‘गौ संरक्षण सम्मान’ प्रदान किया गया।
मंचासीन अतिथियों को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक ‘छत्तीसगढ़ चिन्हारी’ स्मृति चिह्न, अंगवस्त्र एवं श्रीफल भेंटकर सम्मानित किया गया। प्रथम सत्र का संचालन डॉ. किरण राठौर ने किया।
कवि सम्मेलन में 55 से अधिक रचनाकारों ने बांधा समां
द्वितीय सत्र में भव्य कवि सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता मानस मर्मज्ञ एवं भगवताचार्य डॉ. सत्यनारायण तिवारी तथा श्री कृष्ण कुमार चंद्रा ने की। सुप्रसिद्ध कवयित्री श्रीमती पूर्णिमा तिवारी एवं युवा साहित्यकार डॉ. शशांक शर्मा ने संयुक्त रूप से प्रभावशाली मंच संचालन किया।
प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए 55 से अधिक कवि-कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रप्रेम, अध्यात्म, सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदना, लोकसंस्कृति और समकालीन परिस्थितियों को स्वर दिया। ओज, भाव, हास्य, व्यंग्य एवं संवेदनाओं से सजी काव्य प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया और समारोह को साहित्यिक ऊर्जा से भर दिया।
इस अवसर पर श्री विजय कल्याणी तिवारी, श्री अशोक शर्मा ‘अद्वितीय’, श्री अमृत लाल पाठक, श्रीमती सुषमा पाठक ‘रानू’, डॉ. सुधा देवांगन ‘शुचि’, श्री गणपत लाल उदय, श्री सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’, डॉ. ऋचा शर्मा ‘श्रेष्ठा’, डॉ. राघवेन्द्र कुमार दुबे, श्रीमती पूर्णिमा तिवारी, श्री विवेक तिवारी, श्रीमती शशि शर्मा ‘अनामिका’, श्री दशरथ लाल भारद्वाज, श्रीमती सरस्वती राजेश साहू, डॉ. आशा मेहर ‘किरण’, श्री हरिशंकर तिवारी, श्री अंजनी कुमार तिवारी ‘सुधाकर’, श्रीमती मंजू तिवारी दीवान, श्री शीतल प्रसाद पाटनवार, श्री दिलीप टिकरिया, श्रीमती कामना पाण्डेय, डॉ. सुनीता मिश्रा, श्री घनश्याम यादव, सुश्री यशु तलवरे, श्री जगदीश प्रसाद सोनी, डॉ. अनिता सिंह, डॉ. शत्रुघ्न जेसवानी, श्री गणेंद्र लाल भारिया, डॉ. कृष्ण कुमार चंद्रा, पंडित कृष्ण कुमार तिवारी, श्री नोबेल श्रीवास, श्रीमती सुषमा बंजारे, श्रीमती अनुसुइया श्रीवास, श्रीमती मंजू लता मेरसा, श्री हेम शंकर पाटिल ‘हेम’, श्री राम निहोरा सिंह राजपूत, श्री सुमन शर्मा बाजपेयी, डॉ. गजेन्द्र तिवारी, श्री भूपेन्द्र श्रीवास्तव, डॉ. रश्मि अग्निहोत्री, श्रीमती सुमित्रा पटेल, श्रीमती अर्चना साहू, श्रीमती पुष्पा शांडिल्य ‘खुशबू’, श्री संजय कुमार हिरवानी, श्रीमती प्रतिभा साहारे ‘प्रीत’, श्री विक्रम सेंगर, श्रीमती द्रौपदी साहू, डॉ. प्रमोद कुमार आदित्य, श्री जगतारन प्रसाद डहरे, श्रीमती तिलोत्तमा पाण्डेय ‘ममता’, ठा. व्यास सिंह ‘गुमसुम’, डॉ. बोधीराम साहू एवं अन्य रचनाकारों ने अपनी सहभागिता से आयोजन को समृद्ध किया।
सामूहिक प्रयासों से सफल हुआ साहित्यिक महोत्सव
कार्यक्रम के सफल आयोजन में संयोजक श्री दीपक दुबे ‘सागर’, सह-संयोजक श्री विक्रम सिंह सेंगर तथा आयोजन टीम के सदस्यों, विशेषकर श्री विनय सिंह राजपूत सहित अन्य सहयोगियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
अंत में सह-संयोजक श्री विक्रम सिंह सेंगर ने अतिथियों, साहित्यकारों, कवि-कवयित्रियों, सम्मानित प्रतिभाओं एवं सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सभी के स्नेह, सहयोग और सामूहिक समर्पण से यह आयोजन सफल एवं स्मरणीय बन सका।
‘संत और सिपाही’ साझा संकलन का यह विमोचन समारोह साहित्य, अध्यात्म, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक चेतना के समन्वय का प्रेरणादायी उदाहरण बना। आयोजन ने यह संदेश दिया कि संतों के विचार समाज को दिशा देते हैं, सैनिकों का शौर्य राष्ट्र को सुरक्षित रखता है और साहित्य इन दोनों आदर्शों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत बनाए रखने का सशक्त माध्यम है।


