बिलासपुर में विकास का ‘जलसमाधि’ मॉडल: जब वीआईपी बंगले ही डूब गए, तो आम जनता का क्या?
बिलासपुर।मूसलाधार बारिश ने नगर पालिक निगम और जिला प्रशासन के विकास के बड़े-बड़े दावों की पोल खोल कर रख दी है। बिलासपुर का विकास जमीनी स्तर पर हुआ है या नहीं, इसका सबसे बड़ा ‘रिपोर्ट कार्ड’ प्रशासनिक अधिकारियों के सरकारी आवासों ने खुद दे दिया है। शहर में स्थिति यह है कि आम इलाकों की बात तो दूर, खुद कलेक्टर, संभागायुक्त (कमिश्नर) और नगर निगम आयुक्त के बंगले पूरी तरह जलमग्न हो चुके हैं।

जब शहर के नीति-निर्धारक और व्यवस्था संभालने वाले शीर्ष अधिकारियों के बंगले ही पानी में डूब जाएं, तो यह स्पष्ट है कि बिलासपुर का विकास नहीं, बल्कि पूरा सिस्टम पानी में डूब चुका है।”
करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी शहर की ड्रेनेज व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। यह स्थिति किसी प्राकृतिक आपदा की वजह से नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्ट व्यवस्था के कारण पैदा हुई है। जब वीआईपी इलाकों और सुरक्षित माने जाने वाले प्रशासनिक परिसरों में घुटनों तक पानी भर गया है, तो शहर की निचली बस्तियों और आम नागरिकों के घरों की भयावह स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
नगर निगम और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत किए गए दावों पर अब जनता सवाल उठा रही है कि आखिर जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा किस विकास में बहाया गया? जब जिम्मेदार अधिकारी खुद को जलजमाव से नहीं बचा पा रहे हैं, तो वे आम जनता को इस नारकीय स्थिति से कैसे निजात दिलाएंगे?
यह बिलासपुर के नागरिकों के साथ सरासर धोखा है। प्रशासन को केवल कागजी आंकड़ों और बैठकों से बाहर निकलकर इस बदहाल ड्रेनेज सिस्टम और भ्रष्टाचार की त्वरित जांच करानी चाहिए, ताकि भविष्य में बिलासपुर को इस तरह ‘जलसमाधि’ लेने से बचाया जा सके।



