सुरज पुरेना की खास रिपोर्ट
Bilaspur। / शासन द्वारा सुशासन तिहार और जनदर्शन जैसे कार्यक्रमों का आयोजन जनता की समस्याओं के त्वरित समाधान के उद्देश्य से किया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। ग्रामीण क्षेत्रों से आए सैकड़ों पीड़ित अब भी अपनी समस्याओं के निराकरण के लिए भटक रहे हैं। पानी, बिजली, आवास, जमीन, पट्टा, सीमांकन जैसी मूलभूत जरूरतों को लेकर गरीब, मजदूर, विकलांग जन लगातार प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन सुनवाई के नाम पर सिर्फ आश्वासन ही मिल रहा है।

सुशासन तिहार के बाद भी पीड़ितों की शिकायतें जस की तस बनी हुई हैं। जनदर्शन में पहुंचने वाले लोगों का आरोप है कि वहां केवल दिखावा होता है, जबकि समस्याओं पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं होती। कई लोगों की शिकायतें वर्षों से लंबित हैं, लेकिन प्रशासन से लेकर नेताओं तक कोई भी ठोस पहल नहीं कर रहा।

पीड़ितों का कहना है कि अगर वे सक्षम होते, तो खुद अपनी समस्याओं का समाधान कर लेते। लेकिन वे मजबूर हैं और जब शासन-प्रशासन ही समाधान नहीं कर पा रहा, तो उम्मीद किससे करें? कुछ लोगों ने यहां तक आरोप लगाए हैं कि कई बार पटवारी, तहसीलदार, सरपंच, यहां तक कि विपक्षी नेताओं द्वारा भी पैसे की मांग की जाती है।
लोगों का कहना है कि नेतागिरी करने वाले चमचे सिर्फ फोटो खिंचवाने में व्यस्त रहते हैं, जबकि गरीब अपनी फरियाद लिए प्रशासनिक गलियारों में धक्के खा रहा है। यह स्थिति सुशासन की असलियत को उजागर करती है कि ‘चाय से ज्यादा केटली गरम’ की कहावत यहां सटीक बैठती है।



