पेंशनर्स के अधिकार,सम्मान और स्वाभिमान का ऐतिहासिक दिवस 17 दिसंबर को बिलासपुर में गरिमामय पेंशनर दिवस समारोह संपन्न
बिलासपुर :- भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ के तत्वावधान में पेंशनर्स के अधिकारों,सम्मान और स्वाभिमान को समर्पित पेंशनर दिवस का भव्य एवं गरिमामय आयोजन 17 दिसंबर को रीति-रिवाज वेंकट हॉल,सरकंडा,बिलासपुर में दोपहर 3 बजे से किया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में पेंशनर्स,सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि,विषय विशेषज्ञ एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। पूरे कार्यक्रम में पेंशनर्स के संघर्ष,उनके संवैधानिक अधिकारों और सम्मानजनक जीवन की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की गई।

कार्यक्रम का शुभारंभ पेंशनर्स के अधिकारों के लिए ऐतिहासिक संघर्ष करने वाले डी.एस.नाकारा के छायाचित्र पर माल्यार्पण कर किया गया। इसके पश्चात वरिष्ठ पेंशनर एवं समाजसेवी डॉ.अवधेश सिंह तथा सुश्री उषा जायसवाल का शॉल एवं श्रीफल भेंट कर सम्मानपूर्वक अभिनंदन किया गया।
कार्यक्रम की भूमिका एवं पेंशनर दिवस के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए संभागीय अध्यक्ष राजेन्द्र कश्यप ने बताया कि भारत में पेंशन प्रणाली की नींव 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात ब्रिटिश शासनकाल में रखी गई थी। इसे इंडियन पेंशन एक्ट 1871 के माध्यम से अंतिम स्वरूप प्रदान किया गया। प्रारंभिक दौर में पेंशन को मुआवजे के रूप में देखा जाता था,किंतु 1 जनवरी 1922 से लागू नियमों को मौलिक नियमों में सम्मिलित नहीं किए जाने के कारण यह व्यवस्था अपने वास्तविक उद्देश्य को पूर्ण रूप से हासिल नहीं कर सकी और पेंशनर्स को लंबे समय तक उचित लाभ से वंचित रहना पड़ा।

उन्होंने आगे बताया कि रक्षा मंत्रालय के वित्तीय सलाहकार रहे डी.एस.नाकारा,जो सितंबर 1972 में सेवानिवृत्त हुए,स्वयं पेंशन विसंगतियों से प्रभावित हुए। मजबूर होकर उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद 17 दिसंबर 1982 को माननीय न्यायमूर्ति यशवंत चंद्रचूड़ ने ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए कहा—“पेंशन न तो कोई उपहार है और न ही इनाम,बल्कि यह सेवानिवृत्त कर्मचारी का संवैधानिक अधिकार है।”न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह अपने सेवानिवृत्त कर्मचारियों को वृद्धावस्था में सम्मानजनक,सुरक्षित और शांतिपूर्ण जीवन सुनिश्चित करे।
इस ऐतिहासिक फैसले के पश्चात देश में वेतन आयोगों का गठन हुआ और पेंशन प्रणाली को एक सशक्त एवं न्यायसंगत स्वरूप मिला। तभी से देशभर के पेंशनर संगठनों ने 17 दिसंबर को अपने स्वाभिमान दिवस के रूप में पेंशनर दिवस मनाना प्रारंभ किया।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने बताया कि उत्तर प्रदेश शासन द्वारा पेंशनर संगठनों की एकजुटता और सशक्त आवाज को महत्व देते हुए पेंशनर दिवस को प्रादेशिक दिवस का दर्जा दिया गया है तथा शासकीय व्यय से जिला,तहसील एवं विकासखंड स्तर पर आयोजन के निर्देश जारी किए गए हैं। इसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ शासन से भी मांग की गई कि पेंशनर दिवस को शासकीय दिवस घोषित कर प्रदेश के सभी जिलों,तहसीलों एवं जनपदों में इसे सरकारी खर्च से मनाने के निर्देश जारी किए जाएं,जिससे पेंशनर्स को उचित सम्मान मिल सके।
कार्यक्रम में विषय विशेषज्ञ हेमंत आदित्य,सुश्री शकुंतला साहू (साइबर सेल),तिलकेश भावे(संयुक्त संचालक,समाज कल्याण)एवं जे.एन.सिंह(कोष एवं लेखा विभाग)ने अपने-अपने विभागों से संबंधित पेंशनर्स की समस्याओं,सुविधाओं एवं योजनाओं की विस्तृत जानकारी दी। सभी अतिथि वक्ताओं का पुष्पमालाओं से स्वागत एवं सम्मान किया गया।
इस अवसर पर श्रीमती सुषमा नामदेव ने पेंशनर दिवस के महत्व पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि पेंशन केवल आर्थिक सहायता नहीं,बल्कि वर्षों की निष्ठावान सेवा का सम्मान है कार्यक्रम के दौरान संघ में दो नए सदस्यों श्रीमती लक्ष्मी सारथी एवं जयश्री नामदेव ने आजीवन सदस्यता ग्रहण की,जिनका उपस्थित सदस्यों द्वारा अभिनंदन किया गया।
कार्यक्रम के अंत में भारतीय राज्य पेंशनर्स महासंघ के अध्यक्ष राकेश जैन ने सभी अतिथियों,वक्ताओं एवं उपस्थित पेंशनर्स के प्रति आभार व्यक्त करते हुए 17 दिसंबर पेंशनर दिवस की शुभकामनाएं दीं तथा पेंशनर्स के अधिकारों की रक्षा हेतु निरंतर एकजुट रहने का आह्वान किया। इसके साथ ही उन्होंने कार्यक्रम के सफल एवं प्रेरणादायी समापन की घोषणा की।

