अमर शहीद हेमू कालानी की जयंती पर दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि
दिनांक: 23 मार्च, 2026 गुलाम भारत के स्वाभिमानी सपूत और क्रांति पुत्र हेमू कालानी को उनकी जयंती पर राष्ट्र का नमन”
[बिलासपुर]: आज 23 मार्च को पूरे देश में अमर शहीद हेमू कालानी की जयंती बड़े गर्व और श्रद्धा के साथ मनाई गई। 23 मार्च 1923 को अविभाजित भारत के सिंध (सक्खर) में जन्में हेमू कालानी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन महानायकों में से एक हैं, जिन्होंने मात्र 19 वर्ष की अल्पायु में माँ भारती के चरणों में अपने प्राणों की आहुति दे दी थी।
त्याग और संकल्प की विरासत
पिता पेसुमल कालानी और माता जेठीबाई के घर जब हेमू की पहली किलकारी गूँजी, तभी से उनमें देशभक्ति के संस्कार कूट-कूट कर भरे थे। उनकी माता जेठीबाई ने सदैव स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाया। इतिहास गवाह है कि हेमू कालानी ने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए कठिन व्रतों का पालन किया और अपनी किशोरावस्था से ही विदेशी शासन के विरुद्ध बिगुल फूँक दिया था।

क्रांति पुत्र का अदम्य साहस
सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान जब ब्रिटिश सेना की एक ट्रेन हथियारों और बारूद के साथ सिंध से गुजर रही थी, तब हेमू कालानी ने अपने साथियों के साथ रेलवे ट्रैक को उखाड़ने का साहसी निर्णय लिया। उनका उद्देश्य उस सैन्य शक्ति को रोकना था जिसका इस्तेमाल भारतीय क्रांतिकारियों को कुचलने के लिए किया जाना था। दुर्भाग्यवश, उन्हें रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया गया।
ब्रिटिश हुकूमत ने उनके सामने शर्त रखी कि यदि वे अपने साथियों के नाम बता दें, तो उनकी फाँसी की सजा माफ कर दी जाएगी। लेकिन ‘स्वाभिमानी हेमू’ ने झुकने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा। 21 जनवरी 1943 को हँसते-हँसते उन्होंने फाँसी के फंदे को चूम लिया।
आज की प्रासंगिकता
आज आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में वक्ताओं ने कहा कि हेमू कालानी का जीवन वर्तमान युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने सिद्ध किया कि बलिदान की कोई उम्र नहीं होती, बस मन में देश के प्रति अटूट प्रेम होना चाहिए। सभा के अंत में दो मिनट का मौन रखकर अमर शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम में वासुदेव परवानी,गोपाल सिंधवानी,खुशाल वाधवानी,अमर रुपानी,मोहन मदवानी कमल दुसेजा हरि किशन सुरेश छाबडा सहित पूज्य पंचायत के सदस्य एवं हेमू कालाणी संस्कृति मंडल के सदस्य सहित अनेकों लोग उपस्थित थे।


