बिल्हा रेल त्रासदी: एक घर के दो बुझ गए चिराग, क्या रेलवे की ‘आर्थिक मदद’ भर पाएगी इस घाव को?
बिल्हा/बिलासपुर | संवाददाता: रूपचंद अग्रवाल
भूमिका: नियति का क्रूर प्रहार कहते हैं वक्त जब करवट लेता है, तो सब कुछ छीन ले जाता है। बिल्हा के अग्रवाल परिवार के साथ हुई हालिया रेल दुर्घटना महज एक ‘हादसा’ नहीं, बल्कि एक हँसते-खेलते परिवार की रीढ़ टूट जाने की दास्तान है। गेवरा-बिलासपुर मेमू लोकल और खड़ी मालगाड़ी के बीच हुई भीषण भिड़ंत ने न केवल पटरियों पर खून बिखेरा, बल्कि बिल्हा नगर के एक प्रतिष्ठित परिवार के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया। इस दुर्घटना ने पिता और पुत्र, दोनों को छीन लिया है, जिससे पूरा क्षेत्र शोक संतप्त है।
घटनाक्रम: जब खुशियाँ मातम में बदल गईं
गतौरा खदान रेल खंड पर हुई इस हृदयविदारक दुर्घटना में पहले अंकित अग्रवाल (पिता तुलाराम अग्रवाल) की मृत्यु की खबर आई। अभी परिवार इस वज्रपात को झेलने की हिम्मत जुटा ही रहा था कि घायल पिता, तुलाराम अग्रवाल (56 वर्ष), पिता मूलचंद अग्रवाल ने भी उपचार के दौरान दम तोड़ दिया।


पिता-पुत्र की एक साथ विदाई ने पूरे बिल्हा नगर को झकझोर कर रख दिया है। जिस घर की जिम्मेदारी इन दो कंधों पर थी, आज वहां केवल चीखें और सन्नाटा शेष है।
एक परिवार पर दुखों का पहाड़
इस त्रासदी की गहराई को समझने के लिए उस घर की स्थिति देखना जरूरी है:
आर्थिक आधार खत्म: घर का पूरा खर्च इन्हीं पिता-पुत्र के कंधों पर था। अब आय का कोई स्रोत नहीं बचा है। असहाय सदस्य: परिवार में एक पुत्र मानसिक रूप से अस्वस्थ है, जो अपनी देखभाल के लिए भी दूसरों पर निर्भर है।
रिश्तों की शून्यता: एक पत्नी ने अपना जीवनसाथी खोया, एक मां ने अपना कुलदीपक खोया और एक बहन के सिर से पिता और
भाई, दोनों का साया एक साथ उठ गया।
रेलवे प्रशासन के रवैये पर उठते सवाल
हादसे के बाद रेलवे प्रशासन ने मृतकों के परिजनों को 10-10 लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा कर अपने कर्तव्यों की ‘इति श्री’ कर ली है। लेकिन यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या किसी इंसान की जिंदगी की कीमत केवल चंद नोटों से लगाई जा सकती है?
क्या 10 लाख रुपये उस मां के बेटे को वापस ला पाएंगे?
क्या यह राशि उस मानसिक रूप से अस्वस्थ भाई का जीवनभर साथ निभा पाएगी?
क्या रेलवे का सिस्टम अपनी तकनीकी खामियों की जिम्मेदारी लेकर परिवार के पुनर्वास की ठोस योजना बनाएगा?
जनता की आवाज: न्याय और नौकरी की मांग
बिल्हा नगर के प्रबुद्ध नागरिकों, पत्रकार संघ और सामाजिक संगठनों ने इस मामले में हुंकार भरी है। बिल्हा हनुमान चालीसा समिति के संरक्षक और छत्तीसगढ़ प्रखर पत्रकार महासंघ के ब्लॉक अध्यक्ष डॉ. आर.सी. अग्रवाल के नेतृत्व में सर्व समाज ने स्वर बुलंद किया है।
प्रमुख मांगें:
स्थायी भरण-पोषण: राज्य और केंद्र सरकार परिवार के लिए तत्काल विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा करे।
शासकीय नौकरी: परिवार के किसी सक्षम सदस्य को उसकी योग्यता के अनुसार तत्काल सरकारी नौकरी दी जाए ताकि भविष्य सुरक्षित हो सके।
जवाबदेही तय हो: रेलवे इस दुर्घटना की उच्च स्तरीय जांच करे और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो ताकि भविष्य में कोई दूसरा परिवार इस तरह न उजड़े।
इस मांग का समर्थन करने वालों में संतोष यादव, दिलीप गुप्ता, संजय अग्रवाल, राजेश शर्मा, सुखी देवांगन, हृदय यादव, राजकुमार मानिकपुरी, जलेश्वर कौशिक, शिवम नौबतका, सुरेंद्र मित्तल, राजेश नागलिया, कैलाश शर्मा सहित पत्रकार विनोद वर्मा, हरीश गुप्ता, कमल गर्ग एवं नगर के समस्त गणमान्य नागरिक शामिल हैं।
आध्यात्मिक संबल और सामूहिक प्रार्थना
इस कठिन घड़ी में परिवार को संबल देने और दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए कुटिया मंदिर, बिल्हा में सामूहिक हनुमान चालीसा का पाठ आयोजित किया जा रहा है। पूरा नगर एक स्वर में ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है कि इस असहनीय पीड़ा को सहने की शक्ति अग्रवाल परिवार को मिले।
निष्कर्ष: व्यवस्था के नाम एक संदेश
यह दुर्घटना हमें याद दिलाती है कि सुरक्षा में एक छोटी सी चूक कितने परिवारों को तबाह कर देती है। शासन और प्रशासन को अब ‘मुआवजा’ बांटने की राजनीति से ऊपर उठकर ‘संवेदना और समाधान’ की दिशा में काम करना होगा। बिल्हा की जनता तब तक शांत नहीं बैठेगी जब तक इस पीड़ित परिवार को उचित न्याय और भविष्य की सुरक्षा नहीं मिल जाती।

