बिलासपुर में “सिंध जो मेलो” का भव्य आयोजन: भगवान झूलेलाल की आरती से गूंजा कुंदन पैलेस

बिलासपुर के कुंदन पैलेस में आज सिंधी समाज द्वारा आयोजित भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम “सिंध जो मेलो” का उत्साहपूर्ण शुभारंभ हुआ। सिंधी संस्कृति, परंपरा और भाईचारे के प्रतीक इस मेले की शुरुआत भगवान झूलेलाल के जयकारों और भव्य आरती के साथ की गई। कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन लाल साईं के पुत्र द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया, जिसके पश्चात समाज के वरिष्ठ जनों ने भक्तिभाव के साथ इष्ट देव की स्तुति की।

प्रमुख अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति
इस सांस्कृतिक महाकुंभ में शहर के प्रमुख राजनैतिक और सामाजिक चेहरों ने शिरकत की। कार्यक्रम में मुख्य रूप से विधायक धरमजीत सिंह, विधायक अमर अग्रवाल और महापौर पूजा विधानी उपस्थित रहे। अतिथियों ने सिंधी समाज की जीवंतता की सराहना करते हुए कहा कि सिंधी समाज ने न केवल व्यापार, बल्कि अपनी संस्कृति और सेवा भाव से शहर को एक नई पहचान दी है।

सिंधी संस्कृति की जीवंत झलक
मेले के दौरान पूरा कुंदन पैलेस सिंधी रंग में रंगा नजर आया। आयोजन के मुख्य आकर्षण निम्नलिखित रहे:
सांस्कृतिक प्रस्तुतियां: समाज के युवाओं और बच्चों ने पारंपरिक सिंधी गीतों और नृत्यों (छेज) के माध्यम से अपनी जड़ों की खूबसूरती को प्रदर्शित किया।
सिंधी खान-पान: मेले में लगाए गए स्टॉल्स पर लोगों ने पारंपरिक व्यंजनों जैसे सिंधी कढ़ी-चावल, दाल-पकवान, कोकी और सई भाजी का लुत्फ उठाया।
कला और मनोरंजन: नई पीढ़ी को अपनी भाषा और इतिहास से जोड़ने के लिए विभिन्न प्रदर्शनी और मनोरंजक स्टॉल्स भी लगाए गए थे।

एकजुटता का संदेश
आयोजन समिति के सदस्यों ने बताया कि “सिंध जो मेलो” का मुख्य उद्देश्य बिखरे हुए समाज को एक मंच पर लाना और युवा पीढ़ी को अपनी गौरवशाली विरासत से परिचित कराना है। उन्होंने कहा, “आज के समय में जब हम आधुनिकता की ओर बढ़ रहे हैं, अपनी जड़ों और सिंधी भाषा को जीवंत रखना अत्यंत आवश्यक है।”
सहयोगी संस्थाएं
इस सफल आयोजन के पीछे पूज्य सिंधी सेंट्रल पंचायत और भारतीय सिंधु सभा बिलासपुर की कड़ी मेहनत रही। कार्यक्रम को सफल बनाने में भारतीय सिंधु सभा युवा एवं महिला विंग तथा सेंट्रल सिंधी युवा एवं महिला विंग के पदाधिकारियों व सदस्यों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
समाज में उत्साह का माहौल
मेले में आए बुजुर्गों और युवाओं ने आयोजन की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। समाज के प्रबुद्ध जनों का मानना है कि ऐसे आयोजनों से न केवल आपसी प्रेम बढ़ता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने के लिए प्रेरित होती हैं। देर शाम तक चले इस मेले में हजारों की संख्या में समाज के लोगों ने हिस्सा लेकर इसे ऐतिहासिक बनाया।


