संवाददाता रुपचंद अग्रवाल
क्या बैंकों में सुरक्षित है आपका पैसा? संविदा कर्मचारियों और टार्गेट के दबाव में चरमराई बैंक प्रणाली
बिल्हा। वर्तमान समय में बैंकिग सेवाओं के बदलते नियम और संविदा कर्मचारियों के भरोसे पूरा तंत्र चलाने की नीति ने भारतीय बैंक प्रणाली की साख और विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। बैंकों में कर्मचारियों की भारी कमी के कारण प्रबंधन संविदाकर्मियों से काम चला रहा है, जिन पर प्रबंधन द्वारा टार्गेट पूरा करने का असीम मानसिक दबाव बनाया जाता है। इस अनुचित दबाव और अनिश्चितता के कारण कर्मचारी अक्सर नौकरी छोड़कर दूसरे बैंकों में चले जाते हैं, जिसका सीधा खामियाजा आम ग्राहकों, पेंशनभोगियों और वरिष्ठ नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है।
विश्वास के नाम पर धोखाधड़ी और टार्गेट का खेल
बैंक प्रणाली पूरी तरह से जन-सामान्य के विश्वास पर टिकी होती है। परंतु, टार्गेट पूरा करने और अपना भारी कमीशन बनाने की होड़ में कई कर्मचारी ग्राहकों के विश्वास का अनुचित लाभ उठा रहे हैं। ग्राहकों को अधिक मुनाफे का झूठा झांसा देकर उनकी जीवनभर की गाढ़ी कमाई, जिसे वे सुरक्षित फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) के रूप में जमा करना चाहते हैं, उसे जोखिम भरे अन्य फंडों या योजनाओं में निवेश करा दिया जाता है। जब ग्राहक बाद में अपने पैसों का हिसाब या सही जानकारी मांगने पहुँचते हैं, तो बैंक प्रबंधक व कर्मचारी टालमटोल रवैया अपनाते हैं। अपने ही मेहनत के पैसों के लिए ग्राहकों को महीनों बैंकों के चक्कर काटने पर मजबूर होना पड़ता है।
असुरक्षा और वित्तीय अनियमितताओं के बढ़ते मामले
क्षेत्रीय बैंकिंग व्यवस्था में वित्तीय धोखाधड़ी और सुरक्षा चूक की घटनाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। गौरतलब है कि पिछले वर्ष ही करोड़ों रुपये की जालसाजी और वित्तीय धोखाधड़ी के मामले में एक महिला बैंक कर्मचारी को जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा था। इसके अलावा, कई बैंक शाखाओं में रात्रि कालीन सुरक्षाकर्मियों की तैनाती तक नहीं है। हाल ही में महज कुछ मिनटों में बैंक लूट लिए जाने की घटनाएं समाचार पत्रों की सुर्खियां बनी हैं, जो सुरक्षा इंतजामों की पोल खोलती हैं।
वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा और लावारिस जमा
कई बैंकों में ग्राहकों का करोड़ों रुपये का गाढ़ा पसीना सालों से बिना किसी निपटारे के पड़ा हुआ है। जब पीड़ित ग्राहक या उनके परिजन इस संबंध में शिकायत दर्ज कराते हैं, तो उन्हें कोई स्पष्ट या संतोषजनक जवाब नहीं मिलता। विशेष रूप से पेंशनभोगियों और वरिष्ठ नागरिकों (सीनियर सिटीजन्स) को बैंकों में मिलने वाली आवश्यक सुविधाएं और सम्मानजनक सेवा नहीं मिल पा रही है। कर्मचारियों की कमी और आपसी तालमेल के अभाव में ये बुजुर्ग घंटों कतारों में खड़े रहने को विवश हैं।
कड़े कदम उठाने की मांग
इस गिरते बैंकिंग स्तर और ग्राहकों के साथ हो रहे धोखे पर अंकुश लगाने के लिए प्रशासन और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को तत्काल हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है। जनहित में यह मांग की जाती है कि:
संविदा प्रथा के बजाय स्थायी और जिम्मेदार कर्मचारियों की भर्ती की जाए।
टार्गेट के नाम पर ग्राहकों को गलत वित्तीय उत्पाद बेचने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
बैंक शाखाओं में सुरक्षा व्यवस्था दुरुस्त की जाए और वरिष्ठ नागरिकों को प्राथमिकता के आधार पर सुविधाएं प्रदान की जाएं।


