अंधेर नगरी, गजब प्रशासन: पोर्टल पर अपील ‘रिजेक्ट’, कागज़ पर 90 दिन का ‘ऑफर’, और तपती गर्मी में पिसता अभियोजन!…
नवा रायपुर: छत्तीसगढ़ के लोक अभियोजन निदेशालय में इन दिनों अजब-गजब खेल चल रहा है। यहां नियम भी अपने हैं और कायदे भी अपने। एक तरफ सरकारी मशीनरी ‘पारदर्शिता’ का ढिंढोरा पीटते नहीं थकती, तो दूसरी तरफ सूचना के अधिकार (RTI) के तहत जवाब मांगने वालों को ‘तकनीकी जलेबी’ की तरह घुमाया जा रहा है।

हाल ही में प्रथम अपीलीय अधिकारी (FAO) श्री के.एस. गावस्कर साहब के न्यायालय से एक ऐसा ही फरमान निकला है, जिसे देखकर आप भी कहेंगे- “वाह रे सिस्टम!”

पोर्टल पर ‘धक्का’, कागज पर ‘न्योता’ –आरटीआई आवेदक एक स्वतंत्र पत्रकार के मामले में जो आदेश जारी हुआ है, वह लाल फीताशाही का एक नायाब नमूना है।
- डिजिटल दुनिया का सच : यदि आप सरकारी पोर्टल खोलकर देखेंगे, तो वहां साफ-साफ लाल अक्षरों में प्रथम अपील का स्टेटस ‘Rejected’ (खारिज) लिखा नजर आएगा। इसे देखकर कोई भी आम आदमी अपना माथा पीट ले कि रास्ते बंद हो गए।
- कागजी दुनिया का सच : वहीं, जब आप गावस्कर साहब के हस्ताक्षर वाला आदेश पढ़ते हैं, तो उसकी कंडिका 5 में बड़े प्रेम से लिखा है कि “आदेश से संतुष्ट न होने पर 90 दिन के भीतर राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील कर सकते हैं।”
अब इसे क्या कहा जाए? एक तरफ पोर्टल पर मुंह पर दरवाजा बंद किया जा रहा है और दूसरी तरफ कागज पर पीछे के दरवाजे से आने का न्योता दिया जा रहा है? जनता यह समझने में नाकाम है कि यह कोई ‘सिस्टम का ग्लिच’ है या फाइलों में उलझाने की सोची-समझी ‘धांधली’?
जज साहब की छुट्टियां, और अभियोजन को ‘सजा-ए-गर्मी’ –इस पूरे प्रकरण में एक और दिलचस्प और दर्दनाक पहलू जुड़ा है – ग्रीष्मकालीन अवकाश का भेदभाव। जहां एक ओर माननीय न्यायाधीश महोदय और न्यायालयीन कर्मचारी भीषण गर्मी में ग्रीष्मकालीन अवकाश का आनंद ले रहे हैं, वहीं अभियोजन विभाग के कर्मचारियों को तपती दोपहरी में कोर्ट के चक्कर काटने पर मजबूर किया जा रहा है।
अपने आदेश में अपीलीय अधिकारी महोदय भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 19 और CrPC की धारा 25 का बड़े ही शान से उल्लेख करते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ये धाराएं केवल कर्मचारियों से कोल्हू के बैल की तरह काम लेने के लिए हैं?
- अगर न्यायालयीन प्रक्रिया में सभी एक व्यवस्था का हिस्सा हैं, तो अवकाश के नियम अभियोजन पर लागू क्यों नहीं होते?
- क्या सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) द्वारा जारी किए गए अध्यादेशों की कोई अहमियत नहीं है? या फिर लोक अभियोजन निदेशालय ने GAD के आदेशों को रद्दी की टोकरी में डालने का मन बना लिया है?
साहब, नियम सबके लिए बराबर क्यों नहीं? –गावस्कर साहब के इस आदेश ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जब कानून एक है, अदालत एक है, तो न्याय प्रणाली के एक हिस्से को आराम और दूसरे हिस्से को भीषण गर्मी में काम का फरमान क्यों? ऐसा लगता है जैसे निदेशालय ने मान लिया है कि अभियोजन विभाग के कर्मचारी इंसान नहीं, कोई मशीन हैं जिन पर न गर्मी का असर होता है और न ही उन पर GAD के नियम लागू होते हैं।
जनता और कर्मचारी अब बस यही पूछ रहे हैं – “साहब, ये आपकी कैसी न्याय व्यवस्था है, जहाँ पोर्टल कुछ और बोलता है, कागज़ कुछ और, और गर्मी सिर्फ एक ही विभाग को लगती है?”




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