कड़े नियमों की बलि चढ़ा छात्रों का भविष्य: परीक्षा केंद्र या ‘यातना केंद्र’?
रायपुर/बिलासपुर: परीक्षाओं का उद्देश्य छात्रों की योग्यता को आंकना होता है, लेकिन जब नियम संवेदनाओं से ऊपर हो जाएं, तो वे भविष्य संवारने के बजाय उजाड़ने का काम करने लगते हैं। शहीद संजय यादव शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, संजय नगर (रायपुर) परीक्षा केंद्र से मानवता को शर्मसार करने वाली तस्वीरें सामने आई हैं, जो शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा करती हैं।

2 मिनट की देरी और 365 दिन की बर्बादी
नियम अनुशासन के लिए होते हैं, लेकिन क्या अनुशासन किसी का एक साल छीन लेने की अनुमति देता है? केंद्र पर देखा गया कि कई छात्र महज 2 मिनट की देरी से पहुंचे, लेकिन लोहे के गेट उनके लिए अभेद्य दीवार बन गए। विनती, आंसू और गुहार का प्रबंधन पर कोई असर नहीं हुआ। क्या सिस्टम के पास उन छात्रों के 365 दिनों का कोई हिसाब है, जो अब बर्बाद हो चुके हैं?
मासूमों को गोद में लेकर पहुंची माताएं, पर सिस्टम संवेदनहीन
इस परीक्षा की विडंबना देखिए कि महिलाएं अपने दूधमुंहे बच्चों को गोद में लेकर दूर-दराज से पहुंची थीं। कड़ाके की धूप और लंबी दूरी तय करने के बाद उन्हें राहत के बजाय सख्त ‘ड्रेस कोड’ और तकनीकी नियमों का हवाला देकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। कई महिला अभ्यर्थी सिर्फ इसलिए परीक्षा से वंचित रह गईं क्योंकि वे विभाग के कड़े ड्रेस कोड के मापदंडों में उलझ कर रह गईं।

व्यापम के वो नियम जो बने ‘फांस’
प्रशासन इन नियमों को पारदर्शिता का नाम देता है, लेकिन धरातल पर ये किसी सजा से कम नहीं हैं:
- समय का क्रूर बंधन: परीक्षा से 2 घंटे पहले पहुंचना अनिवार्य, 1 मिनट की देरी पर भी नो-एंट्री।
- ड्रेस कोड की सख्ती: केवल हल्के रंग के आधी बांह (Half Sleeves) के कपड़े। गहरे रंग (Dark Colors) पूरी तरह वर्जित।
- आभूषणों पर पाबंदी: मंगलसूत्र, चूड़ियां और कान की बालियां तक उतरवा दी गईं, जिससे महिला अभ्यर्थियों को भारी असहजता हुई।
- जूते-मोजे प्रतिबंधित: केवल साधारण चप्पल की अनुमति, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों से आए छात्र अनजान थे।
चंद नकलचियों की सजा भुगत रहे ईमानदार छात्र
हाल ही में प्रदेश में नकल के कुछ शातिराना मामले सामने आए। लेकिन प्रशासन की विफलता देखिए कि उन मुट्ठी भर नकलचियों को रोकने के नाम पर नियमों को इतना ‘क्रूर’ बना दिया गया है कि इसका खामियाजा उन ईमानदार छात्रों को भुगतना पड़ रहा है जो साल भर कड़ी मेहनत करते हैं।
रिपोर्टर की कलम से:
क्या सिस्टम इतना अंधा हो चुका है कि उसे एक मां की ममता और एक छात्र की साल भर की मेहनत दिखाई नहीं देती? सुरक्षा जरूरी है, लेकिन क्या वह किसी के भविष्य से ज्यादा कीमती है? समाज को इस संवेदनहीनता के खिलाफ आवाज उठानी ही होगी।
रिपोर्ट: अमित पवार
जिला क्राइम रिपोर्टर,
सीजी क्राइम न्यूज, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


