सागर में निस्तारी तालाब और 5.50 एकड़ भूमि को लेकर विवाद गहराया, दोनों पक्षों ने उठाए सवाल
ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री से की तालाब बचाने और निष्पक्ष जांच की मांग, भूमिस्वामियों ने बार-बार शिकायतों को बताया द्वेषपूर्ण
बिलासपुर/तखतपुर। संवाददाता : अश्वनी यादव। ग्राम पंचायत सागर में निस्तारी तालाब की भूमि और खसरा नंबर 288 की 5.50 एकड़ निजी भूमि को लेकर विवाद एक बार फिर सामने आया है। एक ओर ग्रामीणों ने निस्तारी तालाब की भूमि को अतिक्रमण से मुक्त रखने, राजस्व अभिलेखों के आधार पर सीमांकन कराने और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए मुख्यमंत्री से गुहार लगाई है। वहीं, संबंधित भूमिस्वामियों ने भूमि पर अपने अधिकार का दावा करते हुए बार-बार शिकायत किए जाने पर आपत्ति जताई है। दोनों पक्षों के बीच भूमि की वास्तविक स्थिति और उपयोग को लेकर विवाद बना हुआ है।
ग्रामीणों ने तालाब की भूमि सुरक्षित रखने की उठाई मांग
ग्रामीणों के अनुसार, ग्राम सागर स्थित निस्तारी तालाब गांव की सामूहिक संपत्ति है। इसका उपयोग ग्रामीण दैनिक जरूरतों, पशुओं और अन्य निस्तारी कार्यों के लिए करते हैं। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि तालाब की भूमि पर कथित अतिक्रमण कर उसे पाटने तथा निजी उपयोग के लिए बाड़ी एवं मकान बनाए जाने का मामला सामने आया है। इसे देखते हुए गांव के सैकड़ों ग्रामीण एकजुट होकर 25 अक्टूबर को मुख्यमंत्री निवास पहुंचे और तालाब की भूमि को सुरक्षित रखने की मांग की।
ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से राजस्व अभिलेखों के आधार पर तालाब की वास्तविक स्थिति की जांच कराने, विधिवत सीमांकन करने तथा यदि जांच में अवैध कब्जा या नियमों का उल्लंघन प्रमाणित होता है, तो नियमानुसार कार्रवाई करने का आग्रह किया। ग्रामीणों का कहना है कि सार्वजनिक जलस्रोतों की भूमि का निजी उपयोग गांव के सामुदायिक हितों और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी पहल किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ व्यक्तिगत विवाद नहीं, बल्कि गांव की सार्वजनिक संपत्ति और पारंपरिक निस्तारी व्यवस्था को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से है।

भूमिस्वामियों ने राजस्व अभिलेखों और न्यायालयीन आदेशों का दिया हवाला
दूसरी ओर, खसरा नंबर 288 की 5.50 एकड़ भूमि से जुड़े भूमिस्वामियों दीनबंधु शर्मा, अयोध्या शर्मा के वारिस श्यामसुंदर एवं आशीष शर्मा, राधेश्याम शर्मा, राजकुमार शर्मा, मिथलेश दुबे और महेन्द्र तिवारी का कहना है कि संबंधित भूमि के संबंध में राजस्व अभिलेखों में उनके अधिकार दर्ज हैं। उनके अनुसार, चकबंदी पट्टा, अधिकार अभिलेख तथा वर्ष 1961-62 से चले आ रहे बी-1 और खसरा अभिलेखों में भूमि का उल्लेख मिलता है। भूमिस्वामियों का दावा है कि मूल भूमि छह हिस्सों में विभाजित है और संबंधित पक्ष अपने-अपने हिस्से पर काबिज हैं।
भूमिस्वामियों के मुताबिक, वर्ष 2015 में तहसीलदार न्यायालय तखतपुर के आदेश पर भूमि का बंटवारा कराया गया था। इसके बाद वर्ष 2020 में महेन्द्र तिवारी और मिथलेश दुबे ने 1.37-1.37 एकड़ भूमि क्रय की थी। उनका कहना है कि अतिरिक्त कलेक्टर के आदेश पर कराए गए सीमांकन में अर्जुन केवट एवं सरपंच प्रतिनिधि दशरथ पाण्डेय के कब्जे में घुरवा-बाड़ी पाए जाने का उल्लेख है। भूमिस्वामियों ने यह भी दावा किया है कि महेन्द्र तिवारी की खसरा नंबर 288/3 स्थित 1.37 एकड़ भूमि से जुड़े मामले में तहसीलदार न्यायालय ने कब्जा हटाने का आदेश दिया था, जिसके विरुद्ध एसडीएम न्यायालय में की गई अपील खारिज हो गई। हालांकि, इन दावों और आदेशों की वर्तमान स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
बार-बार शिकायतों पर जताई आपत्ति, निष्पक्ष जांच की मांग
भूमिस्वामियों का आरोप है कि अर्जुन केवट, अनिल यादव, लक्ष्मी केवट, लक्ष्मी साहू, मनोज साहू एवं अर्जुन यादव द्वारा भूमि को लेकर बार-बार शिकायतें की जा रही हैं। उन्होंने इन शिकायतों को व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित बताते हुए कहा कि वे पहले भी संबंधित अधिकारियों के समक्ष भूमि से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत कर चुके हैं। उनका कहना है कि भूमि विवाद से संबंधित प्रकरण सिविल न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए सभी तथ्यों और अभिलेखों के आधार पर ही निर्णय लिया जाना चाहिए।

भूमिस्वामियों ने प्रशासन से राजस्व अभिलेखों, सीमांकन रिपोर्ट और न्यायालयीन आदेशों के आधार पर मामले की जांच करने तथा वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। वहीं, ग्रामीणों की प्रमुख मांग निस्तारी तालाब की भूमि की पहचान कर उसे अतिक्रमण से सुरक्षित रखने और सार्वजनिक उपयोग के लिए संरक्षित करने की है।
अब प्रशासनिक जांच पर टिकी निगाहें
ग्राम सागर का यह मामला निजी भूमि के स्वामित्व और सार्वजनिक निस्तारी तालाब की भूमि की पहचान, दोनों से जुड़ा है। ऐसे में राजस्व अभिलेखों, पुराने नक्शों, खसरा-बी-1, सीमांकन रिपोर्ट और संबंधित न्यायालयीन आदेशों का परीक्षण महत्वपूर्ण होगा। निष्पक्ष जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि विवादित भूमि की वास्तविक स्थिति क्या है और किन हिस्सों पर किसका अधिकार बनता है। संबंधित शिकायतकर्ताओं, वर्तमान सरपंच तथा अन्य पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद मामले की तस्वीर और स्पष्ट हो सकेगी।



